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Tuesday, 19 April 2016

यह है कोहिनूर हीरे की कहानी: अब भारत सरकार ने भी कुछ अजीब बात कही है

यह है कोहिनूर हीरे की कहानी: अब भारत सरकार ने भी कुछ अजीब बात कही है

कोहिनूर को भारत वापस लाने की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भारत को कोहिनूर हीरे पर दावा नहीं करना चाहिए। क्‍योंकि यह न तो ब्रिटेन ने चुराया और न इसे जबरदस्‍ती ले जाया गया। सोमवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह जवाब दिया। सरकार की ओर से उच्‍चतम कोर्ट में पेश हुए सॉलिसीटर जनरल रंजीत कुमार ने कहा कि संस्‍कृति मंत्रालय का यही विचार है।
Kahinoor Diamondउन्‍होंने कहा कि 1849 सिख युद्ध में हर्जाने के तौर पर दिलीप सिंह ने कोहिनूर को अंग्रेजों के हवाले किया था। अगर उसे वापस मांगेंगे तो दुसरे मुल्कों की जो चीज़ें भारत के संग्रहालयों में हैं उन पर भी विदेशों से दावा किया जा सकता है। इस पर कोर्ट ने कहा की हिन्दुस्तान ने तो कभी भी कोई उपनिवेश नहीं बनाया न दूसरे की चीज़ें अपने यहां छीन कर रखी। सॉलिसीटर जनरल ने सोमवार को कहा कि इस मामले में अभी विदेश मंत्रालय का जवाब आना बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र से छह सप्‍ताह के भीतर विस्‍तार से जवाब देने को कहा है। इससे पहले कोर्ट ने 9 अप्रैल को केंद्र से कोहीनूर को वापस लाने पर अपनी स्थिति साफ करने को कहा था। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्‍या इस बात पर सहमति है कि केस को खारिज कर दिया जाए क्योंकि ऐसा होने पर सरकार को भविष्‍य में दिक्‍कत हो सकती है। इस मामले में ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस फ्रंट ने याचिका दायर कर रखी है।
बता दें कि ब्रिटिश सरकार ने 2013 में कोहिनूर वापस देने की मांगों को खारिज कर दिया था। रोचक बात है कि 1850 में डलहौजी के मार्कीज ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा क्‍वीन विक्‍टोरिया को उपहार में देने को बाध्‍य किया था। कोहिनूर की कीमत 200 मिलियन डॉलर आंकी जा रही है।
कोहिनूर हीरे की खासित
105 कैरट का कोहिनूर करीब 150 साल से ज़्यादा वक्त से ब्रिटिश ताज का हिस्सा रहा है। माना जाता है कि यह आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा के एक खान से निकला था। शुरुआत में कोहिनूर हीरा पूरे 720 कैरेट का हुआ करता था। कई सालों तक यह खिलजी वंश के खजाने में रहा। इसके बाद यह मुगल शासक बाबर के पास पहुंचा। शाहजहां के मयूर सिंहासन से होता हुआ यह कोहिनूर हीरा महाराज रंजीत सिंह तक पहुंचा। कहा जाता है कि यह हीरा 1848 के ब्रिटेन-सिख युद्ध के बाद ब्रिटेन के हाथ उस वक्त आया जब नाबालिग दलीप सिंह ने इसे ब्रितानी शासकों को सौंप दिया था। तभी से कोहिनूर ब्रितानी ताज में लगा हुआ है। ब्रिटेन का दावा है कि नाबालिग दलीप सिंह ने कोहिनूर क़ानूनी आधार पर उन्हें दिया, लेकिन भारतीय इतिहासकारों का तर्क है कि ऐसा नहीं हुआ और दलीप सिंह को कोहिनूर देने के लिए मजबूर किया गया।
पाकिस्‍तान भी करता रहा है दावा
फरवरी में लाहौर कोर्ट में एक याचिका दायर करके इसे पाकिस्‍तान लाने की मांग की गई। कहा गया कि कोहिनूर हीरा अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह ने लाहौर के बादशाह रंजीत सिंह को तोहफ़े के तौर पर दिया था। रंजीत सिंह के बेटे दलीप सिंह को जब हटाया गया तब पाकिस्‍तान के पंजाब के राजा थे। फिर ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनसे कोहिनूर ले लिया। बाद में कहानी बनाई गई कि ये हीरा दलीप सिंह ने अंग्रेज़ों को दे दिया। ये हीरा जबरन लिया गया था। हीरे की चोरी लाहौर से की गई इसलिए कोहिनूर पर भारत से कहीं ज़्यादा पाकिस्तान का हक है। वहीं भारतीय इतिहासकार उनके इस दावे को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान 1947 के बाद अस्तित्व में आया। उसके पहले का सब कुछ हिंदुस्‍तान का है।
इसी तरह बांग्‍लादेश और साउथ अफ्रीका भी इस हीरे पर दावा करता रहा है। कोहिनूर की कहानी माना जाता है कि यह हीरा अभिशप्‍त है। जिस राजवंश के पास गया, वो खत्‍म हो गया। कहा जाता है कि 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में यह हीरा काकटीय वंश के पास आया। इसके बाद से इस वंश के बुरे दिन शुरू हो गए और 1323 में तुगलक शाह प्रथम से लड़ाई में हार के साथ काकटीय वंश समाप्त हो गया। तुगलक वंश भी ज्‍यादा समय तक नहीं चला। यह हीरा तुगलक से मुगलों तक पहुंचा। 16 वीं सदी में शाहजहां ने इस कोहिनूर हीरे को अपने सिंहासन में जड़वाया। 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर कब्‍जा कर लिया। वह कोहिनूर हीरे को फारस ले गया। 1747 ई. में नादिरशाह की हत्या हो गयी और कोहिनूर हीरा अफ़गानिस्तान के शहंशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंच गया। 1813 में अफ़गानिस्तान से यह लाहौर के राजा रंजीत सिंह के पास आ गया। जब रंजीत सिंह मौत के करीब थे तब उन्होंने कोहिनूर को उड़ीसा के एक हिंदू मंदिर को देने की बात वसीयत में लिखी, लेकिन उनकी मौत के बाद ब्रितानी शासकों ने वसीयत पर अमल नहीं किया।

UP : ओवेसी ने खेला मास्टर स्ट्रोक , खट्टे होंगे विरोधी पार्टियों के दांत

UP : ओवेसी ने खेला मास्टर स्ट्रोक , खट्टे होंगे विरोधी पार्टियों के दांत

वाराणसी. विधानसभा चुनाव के लिए सियासी दांव-पेंच लगने शुरू हो चुके हैं। सपा-बसपा के बाद अब ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी एसी रणनीति अपनाई है कि है कि सपा, बसपा, भाजपा समेत सभी पार्टियों के दांत खट्टे हो जायेंगे।
Asaduddin Owaisi campaigning in Aurangabadप्रदेश अध्यक्ष के मुताबिक सपा को मुस्लिम कार्ड तो भाजपा-बसपा को वह हिंदू व दलित कार्ड से पीछे छोड़ने की तैयारी कर रही है। ओवैसी की पार्टी के बढ़ते रसूख का ही असर है कि पार्टी में टिकट लेने वालों की बाढ़ सी आ गई है। अगर पार्टी इसी गति से आगे बढ़ती रही तो विधानसभा चुनाव में अच्छे दलों के भी दांत खट्टे कर देगी। सपा को सबसे अधिक नुकसानआल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन के सक्रिय होने के बाद सबसे अधिक नुकसान सपा को होता दिख रहा है। अबतक मुस्लिम मतदाता कांग्रेस अथवा सपा के पाले में नजर आते थे, लेकिन जिस तरह से ओवैसी की पार्टी सोशल मीडिया पर सक्रिय हुई है, उससे सपा को सबसे अधिक नुकसान होता दिख रहा है। बहरहाल आने वाले दिनों में स्थिति और साफ हो जाएगी।
Asaduddin Owaisi
दरअसल, एआईएमएमआईएम ने यूपी चुनाव के लिए सारी गुणा-गणित कर ली है। पार्टी का मानना है कि वह उन सीटों पर अधिक फोसक करेगी जहां मुस्लिम मतदाता जीत-हार को तय करेंगे। इसके लिए सीटों का ग्राफ भी तैयार कर लिया गया है। पार्टी अपने क्षेत्र में पकड़ रखने वाले हिंदू चेहरों को भी टिकट देगी, जिससे कि उसकी जीत सुनिश्चित हो सके। पार्टी का मानना है कि यूपी में दलित कार्ड के नाम पर सिर्फ धोखा हुआ है। ऐसे में पार्टी इसे प्रमुखता से उठाएगी।
आल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन के प्रदेश अध्यक्ष शौकत महुली ने बताया कि वर्तमान में प्रदेश में 110 ऐसी सीट हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं की वोट प्रतिशत 30 से 39 प्रतिशत है। 44 सीट ऐसी हैं जहां ये वोट प्रतिशत बढ़कर 40 से 49 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। 11 सीट ऐसी है जहां मुस्लिम मतदाता 50 से 65 प्रतिशत तक हैं। शौकत ने बताया कि पार्टी में टिकट का फैसला ओवैसी करेंगे, लेकिन पार्टी यूपी में अधिक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ेगी।  50 से अधिक सीटों पर फार्म बंट गएशौकत महुली ने बताया कि पार्टी में टिकट लेने वालों की कतार लगी हुई है। 50 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के इच्छुक कार्यकर्ता फार्म ले गए हैं। अब वे फार्म भरकर बॉयो़डाटा के साथ देंगे। शौकत ने बताया कि पार्टी अच्छे दलित चेहरों को मैदान में उतारेगी।

शराब के ठेके हटाओ नहीं तो इस्लाम अपना लेंगे

शराब के ठेके हटाओ नहीं तो इस्लाम अपना लेंगे

जोधपुर। भादवासिया में पिछले 15 दिनों से शराब की दुकान खोलने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे निवासियों ने अब दमकी दी है कि अगर दुकान नहीं हटाई गई तो वे इस्लाम अपना लेंगे।
जिला कलेक्टर की एक टीम ने प्रदर्शनकारियों से बात करने की कोशिश की पर उनमें से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं। उनकी पहली और आखिरी इच्छा यही है कि उनके क्षेत्र से शराब की दुकान खोलने की योजना कैंसल कर दी जाए।
भादवासिया के निवासी अशोक ने कहा कि हम डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के अनुनायी हैं और ‘शराब-बंदी’ के चैंपियन हैं। हम अपने इलाके में इस दुकान को खोलने की अनुमति नहीं देंगे। अगर प्रशासन कदम नहीं पीछे नहीं लेता तो प्रदर्शन के तौर पर हम सब अपना धर्म परिवर्तन कर लेंगे और इस्लाम अपना लेंगे।
वहीं दूसरी तरफ, डिस्ट्रिक्ट एक्साइज़ ऑफिसर राजवीर सिंह यादव ने कहा कि हमारी टीम उस जगह पर गई। हमें पता चला कि दुकान को नियमों और शर्तों को पूरा करने के बाद ही परमिट दिया गया है।
यादव ने कहा कि हमने उन्हें बताया कि यह दुकान सारे जरूरी मापदंडों को पूरा करती है, पर वे लोग टस से मस नहीं हुए। हम उनसे फिर एक बार बात करेंगे। संत रविदास कॉलोनी के निवासियों ने एक जनमत संग्रह करवाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि 51% से ज्यादा लोग शराब की दुकान खोलने के विरोध में होंगे पर यादव का कहना है कि चूंकि दुकान इस साल आवंटित की गई है इसलिए जनमत संग्रह के बारे में अगले साल ही सोचा जा सकता है।
शराब की दुकानों के लिए मिले नए आवंटनों से स्थानीय लोगों में असंतोष आ गया है। राज्य के कई जगहों पर लोग इसी तरह से शराब की दुकानों के खुलने का विरोध कर रहे हैं।
दुकान की लोकेशन का चुनाव लाइसेंस होल्डर की जिम्मेदारी होती है। यह चुनाव एक्साइज़ डिपार्टमेंट द्वारा दिए गए नियम और शर्तों के हिसाब से होना चाहिए, पर इसके बावजूद कई दुकानों की लोकेशन के चुनाव में इन नियमों का उल्लंघन किया जाता है। बल्कि, एक्साइज़ डिपार्टमेंट खुद कई दुकानों की लोकेशन नियमों के उल्लंघन के चलते बदल चुका है।

UK: Muslim ‘expert’ on Islamist radicalisation says stabbed Ahmadi shopkeeper was ‘not a real Muslim’

UK: Muslim ‘expert’ on Islamist radicalisation says stabbed Ahmadi shopkeeper was ‘not a real Muslim’

Top expert on Islamist radicalisation is investigated by university for saying slain Muslim shopkeeper was ‘not a real Muslim’

  • Researcher Shiraz Maher wrote he does not ‘regard Ahmadis as Muslims’
  • Came days after man admitted killing Asad Shah for ‘disrespecting’ Islam
  • Glasgow shopkeeper Mr Shah was part of the the Ahmadiyya community
  • Maher has apologised for remarks which are being investigated by King’s College London

A top expert on Islamist radicalisation is being investigated for saying that a slain Muslim shopkeeper was ‘not a real Muslim’, it has been reported.
Shiraz Maher, a researcher at King’s College London, wrote on Facebook that he does not ‘regard Ahmadis as Muslims’ – days after a taxi driver admitted killing Asad Shah because he ‘disrespected’ Islam’.
Mr Shah, part of the Ahmadiyya community, was knifed to death in his shop in what was feared at the time to have been a sectarian attack against the peace-loving branch of Islam he followed.
Shiraz Maher, a researcher at King's College London, wrote on Facebook that he does not 'regard Ahmadis as Muslims' - days after a taxi driver admitted killing Asad Shah (pictured) because he 'disrespected' Islam'
Shiraz Maher, a researcher at King's College London, wrote on Facebook that he does not 'regard Ahmadis as Muslims'
Earlier this month, taxi driver Tanveer Ahmed, accused of his murder, said through his lawyer that he killed the much-loved family man because he had claimed to be ‘a prophet’.
Days later Mr Maher, a senior research fellow at the International Centre for the Study of Radicalisation, reportedly wrote on Facebook: ‘I really wonder if I’m missing something here but I don’t regard Ahmadis as Muslim.’
According to Richard Kerbaj of the Sunday Times, the Sunni Muslim added: ‘Obviously this does not mean I think they should be persecuted or suffer for their beliefs … yes, condemn the murder and, more long term, suck up the heat out of Muslim hostilities directed towards them but that still doesn’t mean that they should then be accepted as Muslim.’
The newspaper reports that he has since apologised for his ‘ill-advised and misjudged’ comments ‘given the circumstances of Asad Shah’s murder and the political context thereafter’.
Hours before his murder, Mr Shah had written on Facebook: 'Good Friday and very Happy Easter, especially to my beloved Christian nation'
He told the Sunday Times that he had often said Ahmadis should not be targeted for their beliefs.
A representative from the Ahmadiyya Muslim Community UK told the Sunday Times that his earlier remarks risked ‘creating division’.
King’s told MailOnline this morning that it is investigating and insisted the comments were his own opinions.
Mr Shah, 40, was killed at his Glasgow shop on March 24 – the day before Good Friday.
Hours before his murder, he had written on Facebook: ‘Good Friday and very Happy Easter, especially to my beloved Christian nation.’
Mr Shah belonged to the Ahmadiyya community, which promotes peace and tolerance but has been persecuted by members of orthodox Islamic sects in Pakistan.
Tanveer Ahmed, 32, remains in custody charged with murder.
MailOnline has made attempts to reach Mr Maher for further comment this morning.

THE ISLAMIC SECT THAT PREACHES LOVE BUT IS HATED AMONG OTHERS

Asad Shah belonged to the Ahmadi Muslim (also known as Ahmadiyya) community, which preaches love and tolerance.
The sect, which has a huge missionary network spreading its values of non-violence, identifies itself as a Muslim movement and follows the teachings of the Koran.
But it is regarded by orthodox Muslims as heretical because followers do not believe Mohammed was the final prophet sent to guide mankind.
As a result, Ahmadi Muslims have been persecuted – particularly in ultra-conservative Pakistan.
It moved its headquarters to Britain in the 1980s and is currently based in Morden, south London.
The reformist movement’s founder was Islamic teacher Mirza Ghulam Ahmad who was born in India in 1835.
The term ‘Qadiani’ is a derogatory religious slur at Ahmadi Muslims. The Ahmadiyya community preaches ‘love for all, hatred for none’. 
But its members are despised as non-Muslim blasphemers by some in the Islamic world.  
The Tahaffuz Khatme Nubuwwat movement is a community section which believes Ahmadis are blasphemers. It was born in Pakistan and says it aims to unite Muslims around the world.
However, its failure to tolerate other religions and non-believers has seen violent attacks on other Islamic sects and Christians.
Its website states: ‘After the creation of Pakistan, the founder and pioneer chief of the Majlis, unequalled orator and great Islamic leader, Sayed Ataullah Shah Bukhari (May Allah’s mercy be upon him) detaching himself from all the political preoccupations, along with all his comrades, devoted his life for the preaching of Islam and refutation of Qadianiat (The movement of the repudiators of the belief in the finality of the Holy Prophet).
‘In Pakistan and many other countries Qadianees have been segregated from the Muslim and have been proclaimed as Non-Muslims.’
The organisation, which has offices in London, also states it exists to ‘educate’ Muslims about the ‘reality’ of the Ahmadiyya community, which it does not agree with.
It says the Ahmadi belief that there were prophets after Mohammed is ‘false’, describing their faith as ‘heretic’. 

नेपाल में स्वाइन फ्लू ने की एंट्री !

भारत से सटे नेपाल के जिलों में स्वाइन फ्लू ने अपना प्रकोप फैकना शुरू कर दिया है ! पोखरा , पाल्पा जिलों में स्वयंव फ्लू तेज़ी से फ़ैल रहा...